कोविड- 19 की पिछली लहर भी अचानक आई. ठीक वैसे ही इस बार भी कोरोना की सेकेंड वेव आई, पर पिछली बार से ज्यादा भयावह रूप लेकर यही नहीं, इसके अलावा भी अन्य संक्रमण विभिन्न माइक्रो ऑर्गनाइज्म, वायरस, बैक्टीरिया भविष्य में अभी कितनी निष्ठुरता, किस रूप में जीवन को प्रभावित करेंगे यह भी एक अबूझ पहेली है. इन सभी को लेकर विचार करें, तो संक्षिप्त सार यह है कि आखिर हम क्यों इंतजार करें कि कोई विषम परिस्थिति हमारे सामने आए, तब हम उसके निस्तारण के लिए प्रयासरत हों, क्यों ना हम आज और अभी से तैयारी शुरू कर के बुद्धिमत्ता का परिचय दें.
निःसंदेह हेल्थ से जुड़ी मूलभूत समस्याओं के लिए सरकार की ओर से किए जा रहे प्रयास सराहनीय तो है, परंतु इनकी सार्थकता तभी है जब यह आम जनमानस की पहुंच में हों. सभी को आकस्मिक चिकित्सा समय पर प्राप्त हो जाए. इसके साथ ही साथ यह भी बहुत आवश्यक है कि आज के बालक, किशोर व युवा वर्ग को शारीरिक व मानसिक रूप से इनको लेकर इस प्रकार तैयार किया जाए कि स्वास्थ्य संबंधित सामान्य संक्रमण या समस्याओं को उनके प्रतिरोधक क्षमता रूपी कवच सहजता व सुगमता से हरा पाएँ, कुछ कंजेनाइटल डिसऑर्डर अनुवांशिक समस्याओं को छोड़कर अनुशासनात्मक जीवनशैली दिनचर्या तथा न्यूट्रिशन युक्त बैलेंस डाइड योगासन, प्राणायाम विशेषकर आयुर्वेद की विशिष्ट शैली के अनुपालन द्वारा किसी भी राष्ट्र के कर्णधार अर्थात युवा वर्ग को तैयार किया जाना चाहिए. एजिंग अर्थात उम्र का बढ़ना शाश्वत सत्य है, पर चालीस के पार होने वाली समस्याओं में मुख्यतः लाइफस्टाइल डिसऑर्डर, डायबिटीज, हाइपरटेंशन, कार्डियोवैस्कुलर डिजीज, ओबेसिटी, हार्मोनल जैसी समस्याओं की गिरफ्त में आंकड़ों के अनुसार एक बड़ा वर्ग आ चुका है. इसी क्रम में कोविड-19 की चपेट में भी कोमोरविडिटी वाले, जिनकी प्रतिरोधक क्षमता कम थी, वे अधिक प्रभावित हुए.
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी कोविड-19 के इस दौर में इम्यूनिटी के महत्व को स्वीकार किया और इसको बढ़ाने के उपाय व कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार कर गाइडलाइंस जारी की. कोविड-19 के बढ़ते प्रसार ने इस बात को साफ कर दिया कि पर्यावरण, फूड चेन, वृक्षारोपण, एन्वॉयरमेंट ग्लोबल वार्मिंग, ग्लेशियर मेल्टिंग, ओजोन लेयर डिप्लीशन, यह सभी कड़ियां आपस में जुड़ीं और उलझी हुई भी है और प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से आगामी पीढ़ी को प्रभावित करती रहेंगी. सेव वॉटर प्लॉटेशन ड्राइव, सेव रिवर, रिड्यूस रेडिएशंस जैसी मुहिम वक्त की मांग है, जो शायद हमें तो नहीं पर प्लेनेट पर भविष्य में कई लोगों का जीवन सहज बना देंगे. हमारी आज की सजगता हमें आने वाले कई पेनडेमिक अथवा उनकी लहरों से बचा सकती है.
इस क्रम में सरवाइव ऑल ऑफ द फिटेस्ट के सिद्धांत का यहां जिक्र आवश्यक हो जाता है. इसके तहत जिसकी स्वास्थ्य एवं प्रतिरोधक क्षमता अच्छी होगी, वही इस दौर में सरवाइव कर पाएगा. क्योंकि वायरस का म्यूटेशन लगातार कई रूपों में होता रहता है. कोविड-19 के कारण जिस तरह आज का वर्ककल्चर भी चेंज हुआ है, ऑनलाइन क्लासेस वर्क फ्रॉम होम, उसने कहीं ना कहीं साइकोलॉजिकली भी हमारे मैटल स्टेटस पर प्रभाव डाला है. हमें स्वयं को शरीर तथा मन की मांग के अनुरूप परिवर्तित करना होगा, जिससे हम शारीरिक तथा मानसिक रूप से सुकून प्राप्त कर सकें. मानसिक स्वास्थ्य का महत्व भी ऐसी परिस्थितियों में बढ़ जाता है, क्योंकि लॉकडाउन के कारण बेरोजगारी, अस्त-व्यस्त शिक्षा प्राप्ति, अपनों को खोने का दुख, सौमित संसाधनों में जीवन यापन, आउटडोर एक्टिविटीज का अभाव, समाज में व्याप्त समस्याओं से लड़ने के लिए एक मजबूत मनः स्थिति वाले व्यक्ति से ही अपेक्षा की जा सकती है, वृक्ष के फल, छांव आदि का लाभ हमारी फ्यूचर जेनरेशन भी उठा सके, इसके लिए हमें आज ही उसके बीज बोने होंगे, प्रतिरोधक क्षमता का डेवलप होना एक सतत प्रक्रिया है, जो स्वास्थ्य संबंधित विकास में सहायक हैं.
(लेखक- डॉ. अर्पिता सी. राज)

