एक बार की बात है जब पांचों पांडव और उनकी पत्नी निर्वासन में थे. उस समय एक संत ने संदेश भिजवाया कि वह उनके साथ भोजन करने आ रहे हैं. जब तक यह संदेश आया, तब तक पांडव भोजन कर चुके थे और उनके पास खाने को और कुछ नहीं बचा था. द्रौपदी (पांडवों की पत्नी) ने भगवान कृष्ण से प्रार्थना की. उसी समय श्री कृष्ण उनके घर आए और कहा, 'मुझे बहुत भूख लगी है.' जब वह अंदर आए तो उन्होंने देखा कि एक पात्र में चावल का केवल एक दाना चिपका हुआ था. उन्होंने चावल का वह दाना उठाया और खा लिया तथा उस बर्तन को अक्षय पात्र में बदल दिया. अक्षय पात्र का अर्थ है, जिसमें रखा पदार्थ कभी घटता नहीं है. तभी जब संत चार सौ लोगों के साथ वहां आए, तो द्रौपदी उन सभी को उस एक पात्र से भोजन खिलाने में सक्षम हो सकीं. वह जितना भी उस पात्र से निकालतीं, उतना ही उससे और मिलता जाता. उस पात्र का पदार्थ कभी समाप्त नहीं होता. इसलिए भारत में ऐसा कहा जाता है, यह एक 'अक्षय पात्र' है, जिसका अर्थ है कि यह सदा देता रहता है. यदि लोग बहुत उदार हैं और वे सदा सेवा कार्य करते रहते हैं, वे अन्य लोगों के लिए योगदान दे रहे हैं, तो आप कहते हैं, 'यह एक अक्षय पात्र है.' इसका तात्पर्य है कि यह कभी कम नहीं होता है.
वहीं दूसरी कथा श्री कृष्ण और उनके मित्र सुदामा की है. एक दिन सुदामा की पत्नी ने उनसे कहा, हम इतना निर्धनता भरा जीवन जी रहे हैं और कृष्ण इ ऐश्वर्यवान हैं. आप उनसे भेंट करने और कुछ धन प्राप्त करने क्यों नहीं जाते. वह आपके बचपन के मित्र हैं. सुदामा ने कहा, उचित है, मैं जाऊंगा, लेकिन मैं खाली हाथ अपने मित्र के पास नहीं जा सकता. मुझे कुछ न कुछ लेकर जाना चाहिए, तब उनकी पत्नी ने एक वस्त्र मैं तीन मुट्ठी भुने हुए चावल बांधकर उन्हें दे दिए, यह चावल का एक कुरमुरा व्यंजन था. जब सुदामा श्री कृष्ण के पास गए, तो कृष्ण ने उनका स्वागत किया और उनके चरण धोए, कथा यह बताती है कि वे इतने अच्छे मित्र थे और उनकी मित्रता में इतना प्रेम था कि सुदामा कृष्ण को चावल देना भूल जाते हैं और उनसे कुछ मांगना भी भूल जाते हैं. क्योंकि वह प्रेम से अभिभूत थे. वे दोनों इतने करीबी थे कि उनसे मिलने के बाद सुदामा उनसे कुछ मांगना ही भूल गए, वह मांग नहीं सके, यहां तक कि वह कुछ बोल ही नहीं पाए थे.
जब वह लौटने वाले थे, तो श्री कृष्ण ने उनसे पूछा, मित्र, तुम मेरे लिए कुछ लाए हो न? मुझे ज्ञात है कि तुम्हारी पत्नी ने कुछ भेजा है मेरे लिए, उसे मुझे दे क्यों नहीं देते, चलो, दे दो! तब श्री कृष्ण ने उन चावलों को खाया. यह सब हुआ और उसके बाद सुदामा बिना कुछ मांगे वापस लौट गए, जब वह घर पहुंचे, तो उन्होंने अपने घर को धन और स्वर्ण से भरा पूरा पाया. इसी कथा को प्रतीक स्वरूप मानकर लोग आज के दिन स्वर्ण खरीदते हैं और एक दूसरे को उपहार में भी देते हैं. यदि आज आप कुछ भी प्राप्त करते हैं, तो वह सदा संवर्धित होता रहेगा. आप उपहार देते हैं, या आप खरीदते हैं, तो उसमें वृद्धि होती है. ऐसी भी मान्यता है. प्रत्येक दिन एक उत्सव है. हमें यह जानने की आवश्यकता है कि जिस दुनिया में हम हैं, वहां की ये सभी वस्तुएं अंतत: कुछ भी नहीं हैं. एक दिन हम सब कुछ यहीं छोड़ देंगे. हमारा शरीर भी इस पृथ्वी में पुनः समा जाएगा. लेकिन तुम और तुम्हारी आत्मा सदा रहेगी. तुम उठ खड़े होगे, क्योंकि तुम शाश्वत हो. कुछ भी असंभव नहीं है जब भक्ति बहुत दृढ़ होती है तब केवल आध्यात्मिक उत्थान ही नहीं, भौतिक वस्तुएं भी सहज ही प्राप्त हो सकती हैं. यही इस कथा का सार है. हम सब यहां केवल कुछ सालों के लिए हैं, लेकिन दुनिया लाखों सालों से बनी हुई है. यहां वृक्ष हैं, पक्षी हैं, बादल बन रहे हैं, वर्षा हो रही है, सूरज चमक रहा है. ये सभी घटनाएं अरबों सालों से हो रही हैं. अगले चालीस-पचास सालों में हम सभी विदा हो जाएंगे, किंतु यह सारा क्रम फिर भी ऐसे ही जारी रहेगा. यही ईश्वरीय शक्ति है.
(लेखक- श्री श्री रविशंकर)

